(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.14. अध्यायः 014
अश्वमेधपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
व्यासनारदकृष्णादिभिर्बन्धुनिधनपरिशोचिनो युधिष्ठिरस्य समाश्वासनेन तत्रान्तर्धानम्॥ 1 ॥ युधिष्ठिरेण भीष्मिदीनामौर्ध्वदेहिकदानेन हास्तिननगरप्रवेशः॥ 2 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्मुनिभिस्तैस्तपोधनैः।
समाश्वस्त राजर्षिर्हितबन्धुर्युधिष्ठिरः॥ 14-14-1(92728)
सोऽनुनीतो भगवता विष्टरश्रवसा स्वयम्।
द्वैपायनेन कृष्णेनि देवस्थानेन चाभिभूः॥ 14-14-2(92729)
नारदेनाथ भीमेन नकुलेन च पार्थिव।
कृष्णया सहदेवेन विजयेन च धीमता॥ 14-14-3(92730)
अन्यैश्च पुरुषव्याघ्रैर्ब्राह्मणैः शास्त्रदृष्टिभिः।
व्यजहाच्छोकजं दुःखं सन्तापं चैव मानसम्॥ 14-14-4(92731)
अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च युधिष्ठिरः।
कृत्वाऽथ प्रेतकार्याणि सर्वेषां कुरुनन्दनः।
अन्वशासच्च धर्मात्मा पृथिवीं सागराम्बराम्॥ 14-14-5(92732)
प्रशान्तचेताः कौरव्यः स्वराज्यं प्राप्य केवलम्।
व्यासं च नारदं चैव तांश्चान्यानब्रवीन्नृपः॥ 14-14-6(92733)
आश्वासितोऽहं प्राग्वृद्धैर्भवद्भिर्मुनिपुङ्गवैः।
न सूक्ष्ममपि मे किञ्चिद्व्यलीकमिह विद्यते॥ 14-14-7(92734)
अर्थश्च सुमहान्प्राप्तो येन यक्ष्यामि देवताः।
पुरस्कृत्याद्य भवतः समानेष्यामहे मखम्॥ 14-14-8(92735)
हिमवन्तं त्वया गुप्ता गमिष्यामः पितामह।
बह्वाश्चर्यो हि देशः स श्रूयते द्विजसत्तम॥ 14-14-9(92736)
तथा भगवता चित्रं कल्याणं बहु भाषितम्।
देवर्षिणा नारदेन देवस्थानेन चैव ह॥ 14-14-10(92737)
नाभागधेयः पुरुषः कश्चिदेवंविधान्गुरून्।
लभते व्यसनं प्राप्य सुहृदः साधुसम्मतान्॥ 14-14-11(92738)
वैशम्पायन उवाच। 14-14-12x(7797)
एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सर्व एव महर्षयः।
अभ्यनुज्ञाप्य राजानं तथोभौ कृष्णफल्गुनौ॥ 14-14-12(92739)
पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवादर्शनं ययुः।
ततो धर्मसुतो राजा तत्रैवोपाविशत्प्रभुः॥ 14-14-13(92740)
एवं नातिमहान्कालः स तेषां संन्यवर्तत।
कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा।
महादानानि विप्रेभ्यो ददतामौर्ध्वदेहिकम्॥ 14-14-14(92741)
भीष्मकर्णपुरोगाणां कुरूणां कुरुसत्तम।
सहितो धृतराष्ट्रेण स ददावौर्ध्वदेहिकम्॥ 14-14-15(92742)
ततो दत्त्वा बहुधनं विप्रेभ्यः पाण्डवर्षभः।
धृताराष्ट्रं पुरुस्कृत्य विवेश गजसाह्वयम्॥ ॥ 14-14-16(92743)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अश्वमेधपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः॥ 14 ॥


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